ज्ञान गंगा की अमोघ चुस्की

आख़िर क्यों एग्जिट पोल में चली झाड़ू ?

आज वसीम बरेलवी का एक सेर याद आ गया – “कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है ये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है” क्या खूब बात कही है जनाब ने ।

कल तारीख थी 8 फ़रवरी 2020 कोई नहीं बात नहीं है तारीखें तो रोज बदलती रहती है पर कल की तारीख शायद आने वाले कुछ दिनों तक याद रखी जाएगी क्योंकि कल मौका था दिल्ली की जनता को अपनी सरकार बदलने का अगर वो उससे खुश नहीं थे।तय प्लान के मुताबिक कल चुनाव हुआ, चुनाव का प्रतिशत भी औसतन रहा और दिल्ली के चर्चित शाहीन बाग में भी अच्छी खासी वोटिंग हुई ।शाम होते- होते वोटिंग का शोर कम हो गया पर न्यूज चैनलों में एग्जिट पोल का शोर शुरू हो गया ।
अगर एग्जिट पोल कि माने तो केजरीवाल एक बार फिर दिल्ली में बहुमत के साथ वापसी करते दिख रहे हैं पर ये सिर्फ रुझान है असली नतीजे तो 11 तारीख को आयेंगे।
लेकिन जो रुझान निकल कर सामने आते है वो भी जनता के विचारो से ही आते है और जनता ही नेताओं को कुर्सी पर बैठाते है और उठाती है।अगर ये एग्जिट पोल सही साबित
तो इस बात पर भी ठप्पा लग जायेगा की

गोली-गाली -गद्दारी पर भारी पड़ा बिजली-पानी -बेरोजगारी!

जो कि जनता के सही निर्णय को दिखाता है। सरकार का गठन जनता और राज्य की समस्याओं को समाप्त करना होता है और जिसको केजरीवाल शायद पूरा करते नजर आ रहे है ।ये जरूरी नहीं कि 5 साल में सरकार द्वारा किए गए सारे वादे पूरे हो जाएं पर इतना जरूर है कि ज़मीनी तौर पर मुद्दो और वादों कि रूप रेखा जरुर तय हो जानी चाहिए और लगता है कि शायद केजरीवाल भी इस बात को बखूबी जानते है और तभी
उन्होंने अपने किये हुए विकास के कार्यों को मुद्दा बनाया और चुनाव लड़ा और शायद वो अपने इस चुनाव में सरकार के साथ वापसी करते नजर आ रहे है ।

शायद उन लोगो को सबक देगा जो धर्म के नाम की राजनीति करते और अपना वोटबैंक सीधा करते है और अपनी नाकामी को छुपाते है, देश का ध्यान जुमलेबाजी से जीतने की कोशिश करते है और शायद इस बात को नहीं समझ पाते की ये जनता है जो अगर प्यार करती है तो लाल नीली बत्ती लगवाती है और नहीं करती तो बत्ती लगा देती है। खैर बेरो़जगारी का मुद्दा गंभीर है पर शायद सत्ता के नशे में चूर हुक्मरानों को ये बात समझ में नहीं आएगी औेर शायद तब तक बहुत देर हो चुकी होगी फिलहाल इंतजार तो दिल्ली के नतीजों का है,अब देखते है की आखिरकार क्या होता है ?

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