ज्ञान गंगा की अमोघ चुस्की

दिल्ली चुनाव की हार और जीत का संपूर्ण विश्लेषण!

आप सोच रहे होंगे कि दिल्ली चुनाव हो गया नतीजें आ गए पर अभी तक मेरा लिखा हुआ ब्लॉग क्यों नहीं आया,तो चलिए आज आपकी इस शिकायत को भी दूर कर देते है।
तारीख 16 फरवरी 2020, जगह दिल्ली का इतिहासिक रामलीला मैदान जहां से एक बार फिर केजरीवाल साहब ने दिल्ली के मुख्मंत्री के तौर पर पद और गोपनीयता की शपथ ली । शपथ की गवाह बनी दिल्ली की आम जनता जिसको केजरीवाल ने अपने शपथ समारोह में स्वयं बुलाया था, यहां पर आप को एक चीज और याद करनी चाहिए वो ये कि एक और लोग शपथ समारोह में खास तौर पर बुलाया गए थे पर वो रामलीला मैदान के कार्यक्रम की जगह किसी और कार्यक्रम में शिरकत करने चले गए, खैर ये सब तो पुरानी बाते है राजनीती में अक्सर ये हुआ करता है,नेता जी कार्यक्रमों में व्यस्त रहते है। बात मुद्दे कि करते है अगर 6 महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव के परिणाम देखें जाएं
तो भारतीय जनता पार्टी ने क्लीन स्वीप किया था और कुछ ऐसे ही मिले झूले प्रदर्शन की उम्मीद विधानसभा चुनाव में भी की जा रही थी पर विधानसभा के चुनाव में न जाने ऐसा क्या हो गया कि अपने बूते लोकसभा में सरकार बनाने वाली पार्टी,राजधानी के राज्य चुनाव में मात्र 8 सीटें ही जीत पाई और लोकसभा में जिस पार्टी के पास 0 सीट थीं उसने विधानसभा के चुनाव में बहुमत के आंकड़े से कही ज्यादा सीट जीतकर सरकार भी बनाई और इतिहास भी। यहां पर आप सोच रहे होंगे की मै कांग्रेस की बात क्यों नहीं कर रहा हूं तो आप को बता दू उनका प्रदर्शन लोकसभा और विधानसभा दोनो में कॉन्स्टेंट रहा 0, शुरुआत से ही सत्ता कि लड़ाई सिर्फ और सिर्फ दो पार्टियों के बीच होती नजर आ रही थी। अगर हार और जीत की वजह को तलाशा जाए तो ये साफ होता है कि जहां केजरीवाल ने बिजली, पानी और बेरोजगारी के दम पर अपना पूरा कैंपेन किया तो वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव प्रचार को संप्रदायिक रंग देने की कोशिश की और जिसका रंग केजरीवाल के मुद्दे और एजेंडे के सामने फिका पड़ गया।केजरीवाल ने अपने चहरे के दम पर चुनाव लड़ा और किसी भी पार्टी को सीधा निशाना न साधते हुए अपने विकाश कार्यों को जनता के सामने ठीक रूप से प्रस्तुत किया तो वहीं दूसरी तरफ दोनों पार्टियों ने अपने चेहरों को अंत तक छुपाए रखा और दिल्ली सरकार को मुफ्तखोरी की पार्टी बताते रहे जिसका नतीजा ये हुआ कि अरविंद केरीवाल सूबे के तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गए। अगर बीते साल हुए 3 राज्यो के चुनावों को देखा जाए तो सिर्फ हरियाणा के ऐलवा बीजेपी कही दूसरी जगह सरकार नहीं बना सकी है,मतलब ये साफ होता है कि जिस कांग्रेस मुक्त भारत का सपना बीजेपी देखती कहीं वो आने वाले साल में पलट ना जाए। फिलाल के तौर पर ये जरूर साफ होता है कि बीजेपी को एक बार फिर अपने पार्टी के एजेंडे के ऊपर पुनर विचार करना चाहिए और साम्प्रदायिकता से ऊपर उठ कर विकास और विश्वास के मुद्दो को जनता के सामने रखना चाहिए, ताकि देश की तरक्की का ग्राफ आगे बढ़े।आने वाले दिनों में बिहार जैसे राज्यो में चुनाव में जहां बीजेपी और जेडीयू के गठबंधन की सरकार है तो देखना ये दिलचस्प हो जाता है कि क्या बीजेपी अपने एजेंडे को आने वाले चुनाव में बदलेगी या फिर पुराने ढर्रे से चुनाव लड़ेगी।

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