ज्ञान गंगा की अमोघ चुस्की

कहानी उस बंगाली बाबू की जिसने ध्यान सिंह को ध्यान चंद बना दिया

कहानी उस बंगाली बाबू की जिसने ध्यान सिंह (DhyanSingh)को ध्यान चंद(Dhyanchand) बना दिया

पिछले 15 अगस्त को (गोल्ड) Gold मूवी रिलीज हुई थी, देश भक्ति और खेल भावना से ओत प्रोत।

मूवी रिलीज का दिन भी बड़ा मुकम्मल था, 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस,

How Dhyan Sing Became Dhyanchand

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हॉकी के इर्द-गिर्द घूमने वाली फिल्म में मुख्य किरदार (अक्षय कुमार)Akshay Kumar ने निभाया था, तपन दास जिन्होंने Gold Movie मे भारत को गोल्ड मेडल जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

कौन थे वह बंगाली बाब?

फिल्मGold में दिखाए गए कुछ दृश्य मुझे ऐसे ही एक बंगाली बाबू की याद दिलाते हैं,
जिन्होंने तपन दास की तरह पूरी भारतीय टीम को सुदृण किया, और  ऊर्जा का संचार करने के साथ-साथ भारत को विश्व चैंपियन भी बनाया। Hockey से उनके लगाव के नाते ही उन्हें प्यार से Mr.Hockey भी कहा जाता है।
सब्र रखिए हम उस महान शख्स का नाम भी आपको बताते हैं कीचड़ में कमल खिलाने वाले उस महान शख्सियत का नाम था –पंकज गुप्ता(Pankaj Gupta)

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Major Dhyan Chand से था एक अनोखा रिश्ता

अब बात जब हॉकी की हो रही हो, तो उसके पुरोधा का जिक्र ना हो तो किस्सा अधूरा अधूरा सा लगता है
जी हां ,हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद(Major Dhyan Chand)
का पंकज गुप्ता (Pankaj Gupta)के साथ अटूट संबंध था।
जानते हैं क्या?
गुरु-शिष्य का, Pankaj Gupta मेजर ध्यानचंद (Major Dhyanchand)के प्रथम कोच थे।
ध्यान चंद(Dhyanchand) से जुड़ा एक और किस्सा हम आपको जरूर बताना चाहेंगे।

Dhyansingh से Dhyanchand बनने की कहानी

हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यान चंद का असली नाम ध्यान सिंह(DhyanSingh) हुआ करता था।
वो Pankaj Gupta ही थे जिन्होंने DhyanSingh को Dhyanchand का नाम दिया और कहा कि आप एक दिन चाँद की तरह चमकोगे, बात भी सही साबित हुई, Pankaj Gupta द्वारा दिये गया उस अनोखे Title की वजह से दुनिया ध्यान सिंह को ध्यान चंद के नाम से जानने लगी। ध्यान चंद ने अपनी आत्मकथा में Pankaj Gupta के साहसिक और देश भक्ति से ओत प्रोत घटनाओं का वर्णन भी किया है।

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1936 Berlin Olympic कि ना भूलने वाली दास्तान

1936 बर्लिन ओलंपिक भारत और जर्मनी दोनों देश हॉकी के फाइनल में पहुंचे थे।
14 अगस्त को फाइनल खेला जाना था, लेकिन भारी बारिश की वजह से खेल रोक देना पड़ा, अगले दिन यानी 15 अगस्त को सुबह 11:00 बजे मैच होना था
सभी लोग चिंतित थे कि रिजल्ट क्या होगा?
तभी अचानक पंकज गुप्ता (Pankaj Gupta)ने चरखे वाला तिरंगा मैदान में फहरा दिया।
उस समय मैदान में 40000 लोग मौजूद थे जिसमें बड़ौदा के महाराज भोपाल की युवराज और भारी संख्या में मौजूद भारतीयों का सीना गर्व से और भी चौड़ा हो गया था। भारतीयों का ऐसा हजूम देखकर हिटलर(Hitler) सहित जर्मनी के सभी दर्शक दंग रह गए।
उस फाइनल मैच में ध्यान चंद तबियत खराब होने की वजह से बाहर बैठे थे, Half time तक भारत 10 से आगे था, साइड लाइन में बैठे ध्यान चंद यह सब देख रहे थे, उनके अंदर का खिलाड़ी उन्हें बाहर बैठने की गवाही नहीं दे रहा था, अब उनसे ना रहा गया, उन्होंने अपने जूते बाहर निकालें और खाली पैर ही जर्मन रक्षापंक्ति के नेस्तनाबूद कर दिया,
जब मैच खत्म हुआ तो Score 8-1 था।
Second Half मैं हुए सातों के सातों goal ध्यान चंद ने किए थे, और भारत को गोल्ड मेडल दिलवा दिया।
कुछ ऐसा ही सीन फिल्म गोल्ड में हमें देखने को मिला था हमें। बड़ा ही सुखद क्षण था वह जब हर जगह केवल भारत की ही गूँज थी।
Pankaj Gupta के साहसिक कारनामे को मेरा शत-शत नमन है।

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