ज्ञान गंगा की अमोघ चुस्की

2019 में ये देश कितना बदला,2020 में क्या है चुनौती…

साल 2019 जा रहा है,अब 2020 का आगमन हो रहा है।वैसे बहुत से लोग बीते हुये दिनों को याद नही करते,बीते हुए पल सुखद भी होते है और कड़वे भी होते है,लेकिन वही कड़वा और सुखद पल को याद करके सबक सीखने की जरुरत है और आगे की योजनाओं पर विचार करने की जरुरत है खैर ये सिर्फ पल और दिन नही है,यह तो एक साल की बात है,वह भी 2019 जैसा, जहां पर दोबारा से भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र में आई यह ख़ुशी की बात थी तो वही दूसरी तरफ भाजपा के कद्दावर नेत्री और नेता सुषमा स्वराज,अरुण जेटली स्वर्ग सिधार गए,दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का भी असमय निधन राजनीतिक जीवन का एक क्षति है।

इस साल देश में सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय लिए गए है: जैसे धारा 370 और राम मंदिर,ये ऎसे मुद्दे है जो कई सालों से चले आ रहे थे उसे मोदी सरकार ने खत्म किया,वही हाल फिलहाल में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जो लोग सड़क पर हैं उन लोगों में आक्रोश है,आने वाले समय में सरकार को और चुनौती का सामना करना पड़ेगा ,गिरती विकास दर,महंगाई,क्षेत्रीय समस्या,बेरोजगारी और बढ़ती जनसंख्या आने वाले समय में सरकार को और दिक्कत का सामना करना पड़ेगा ,जिसने भारत की राजनीति, समाज, संस्कृति और उसके बौद्धिक विमर्शों को पूरा का पूरा बदल दिया है,जाते हुए समय में जिस तरीके से देश का माहौल है आने वाले समय में इससे कड़वाहट और नफरत ही पैदा होगी,यह साल मिला जुला रहा है और कई और ऐतिहासिक फैसला भी लिए गए हैं, आइए नजर डालते है साल भर के कामकाज पर  –

इस साल ने हमें आशा, निराशा, उम्मीदों और सपनों के साथ चलने के सूत्र भी दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार युवाओं पर भारी उम्मीदें जता रहे थे। हम देखें तो भारत का स्टार्टअप तंत्र जिस तरह से युवा शक्ति के नाते प्रभावी हुआ है, वह हमारी एक बड़ी उम्मीद है। सन 2019 में ही कुल 1300 स्टार्टअप प्रारंभ हुए। कुल 27 कंपनियों के साथ भारत में पहले ही चीन और अमेरिका के बाद तीसरे सबसे ज्यादा यूनिकार्न (एक अरब से ज्यादा के स्टार्टअप) मौजूद हैं। भारत की यह प्रतिभा सर्वथा नई और स्वागतयोग्य है। वहीं दूसरी ओर मंदी की खबरों से इस साल बाजार थर्राते रहे। निजी क्षेत्रों में काफी लोगों की नौकरियां  गईं और नए रोजगार सृजन की उम्मीदें भी दम तोड़ती दिखीं। बहुत कम ऐसा होता है महंगाई और मंदी दोनों साथ-साथ कदमताल करें। पर ऐसा हो रहा है और भारतीय इसे झेलने के लिए मजबूर हैं। नीतियों का असंतुलन, सरकारों का अनावश्यक हस्तक्षेप बाजार की स्वाभाविक गति में बाधक हैं।

भारत जैसे महादेश में इस साल की दूसरी तिमाही में विकास दर 4.5 फीसद रह गयी थी, अगले छह माह में यह क्या रूप लेगी कहा नहीं जा सकता। इस साल पांच फीसदी की विकास दर भी नामुमकिन लग रही है। सच तो यह है कि मोदी सरकार ने अपने प्रारंभिक दो सालों में जो भी बेहतर प्रदर्शन किया, नोटबंदी और जीएसटी ने बाद के दिनों में उसके कसबल ढीले कर दिए। बिजनेस टुडे के पूर्व संपादक प्रोसेनजीत दत्ता मानते हैं कि- “यदि सहस्त्राब्दी का पहला दशक मुक्त बाजार सिद्धांत की अपार संभावनाओं वाला था तो यह दशक बेतरतीब सरकारी हस्तक्षेप वाला रहा।” ऐसे में आने वाला साल किस तरह की करवट लेगा इसके सूत्रों को जानने के लिए मार्च, 2020 तक नए बजट के बाद की संभावनाओं का इंतजार करना होगा। इसमें दो राय नहीं कि वैश्विक स्तर पर भारत की विदेश नीति में प्रधानमंत्री ने अपनी सक्रियता से एक नई ऊर्जा भरी, किंतु भारत की स्थानीय समस्याओं, लालफीताशाही, शहरों में बढ़ता प्रदूषण, कानून-व्यवस्था के हालात ऐसे ही रहे तो उन संभावनाओं का दोहन मुश्किल होगा।

साल के आरंभिक दिनों में हुए पुलवामा हमले ने जहां हमारी आंतरिक सुरक्षा पर गहरे सवाल खड़े किए, वहीं साल के आखिरी दिनों में मची हिंसा बताती है कि हमारा सभ्य होना अभी शेष है। लोकतांत्रिक प्रतिरोध का माद्दा अर्जित करने और गांधीवादी शैली को जीवन में उतारने के लिए अभी और जतन करने होंगे। हम आजाद तो हुए हैं पर देशवासियों में अभी नागरिक चेतना विकसित करने में विफल रहे हैं। यह साधारण नहीं है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और अपने ही लोगों को ही प्रताड़ित करने में हमारे हाथ नहीं कांप रहे हैं। पुलवामा में 40 सैनिकों की शहादत देने के बाद भी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर हमारी नागरिक चेतना में कोई चैतन्य नहीं है। राजनीतिक लाभ के लिए भारतीय संसद में बनाए गए कानूनों को रोकने की हमारी कोशिशें बताती हैं कि विवेकसम्मत और विचारवान नागरिक अभी हमारे समाज में अल्पमत में हैं।

साल के आखिरी महीने की कड़वाहटों को छोड़ दें तो जाता हुआ साल 2019 कई मामलों में बहुत उम्मीदें जगाने वाला साल भी है। कश्मीर में धारा 370 की समाप्ति और राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला दो ऐसी बातें हैं जो इस साल के नाम लिखी जा चुकी हैं। इस मायने में यह साल हमेशा के लिए इतिहास के खास लम्हों में दर्ज हो गया है।

भारत जैसे महादेश में इस साल की दूसरी तिमाही में विकास दर 4.5 फीसद रह गयी थी, अगले छह माह में यह क्या रूप लेगी कहा नहीं जा सकता। इस साल पांच फीसदी की विकास दर भी नामुमकिन लग रही है। सच तो यह है कि मोदी सरकार ने अपने प्रारंभिक दो सालों में जो भी बेहतर प्रदर्शन किया, नोटबंदी और जीएसटी ने बाद के दिनों में उसके कसबल ढीले कर दिए।

इसमें दो राय नहीं कि वैश्विक स्तर पर भारत की विदेश नीति में प्रधानमंत्री ने अपनी सक्रियता से एक नई ऊर्जा भरी, किंतु भारत की स्थानीय समस्याओं, लालफीताशाही, शहरों में बढ़ता प्रदूषण, कानून-व्यवस्था के हालात ऐसे ही रहे तो उन संभावनाओं का दोहन मुश्किल है।

2019 के जाते जाते फिर से देश एक बार सहम गया।फिर से निर्भया की याद दिला दी।2012 से अब तक सुरक्षा के मद्देनजर कुछ नही बदला,दिशा की घटना ने सभी को झकझोर कर रख दिया ,निर्भया के दोषियों को फाँसी न देना कानून को भी कटघरे में खड़ा कर देती है,आने वाले समय में इसे जड़ से मिटाने की सख़्त जरुरत है।किसानो की आत्महत्या,फसल का उचित मूल्य न मिलना,बेरोजगारी,प्रकृति आपदा,सुरक्षा,महंगाई,क्षेत्रीय समस्या,जनसंख्या,कृषि संकट,घुसपैठिये,आंतकवाद आने वाले समय में यह बहुत बड़ी चुनौती है।ये सब सवाल 2020 में खत्म हो जायेंगे ,ये सब सोचना बेईमानी है।

इस साल भाजपा के हाथो से राजस्थान,छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश,महाराष्ट्र और झारखंड निकल गया।आने वाले 2020 में दिल्ली और बिहार भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती है।

2019 बहुत सारे फैसला और निर्णय दे कर गए है।आने वाले 2020 के लिए नवसंकल्प लेने की भी जरुरत है।सभी संकटों के हल तलासने होंगे।सभी को मिलकर कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने की जरुरत है। अलविदा-2019,स्वागत-2020.

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