ज्ञान गंगा की अमोघ चुस्की

पैर में छह उंगलियों की वजह से जो लड़की चौडे जूते नहीं खरीद पा रही थी,आज उसने भारत के लिए सोना जीत लिया है

पैर में छह उंगलियों की वजह से जो लड़की चौडे जूते नहीं खरीद पा रही थी, आज उसने भारत के लिए सोना जीत लिया है

Swapna Barman becomes first Indian to win gold in Heptathlon in Asian Games.

“जाना है पार-जाना है पार
 वाफिक नहीं है कोई मेरी यहाँ
 अजनबी उड़ानों से
 मेरे जैसा कोई कहा
 मेरे साथ सारा जहाँ”

बहुत दिनों पहले यह गाना सुन रखा था आज लिखते वक्त इसकी सार्थकता समझ में आ रही है,
हो भी क्यों ना आज जश्न का दिन है,
swapna-barman-gold-gyanchuskiभारत की उस महान बेटी के लिए शब्दों के ज्वालामुखी इस तरह प्रज्वलित हो रहे हैं, क्योंकि उसकी मेहनत रंग लाई है,
जी हां, हम बात कर रहे हैं एशियाई खेलों में भारत के लिए Heptathlon स्पर्धा में भारत के लिए स्वर्ण पदक दिलाने वाली Swapna Barman की जिसने विकट परिस्थितियों के बावजूद Indonesia में भारत का परचम लहरा दिया है।

Heptathlon स्पर्धा है क्या?

swapna-barman-gold-asiad-gyanchuski
Source: Google Images

Heptathlon Track & Field कि 7 अलग-अलग विधाओं का संयुक्त प्रतियोगिता होती है जिसमें प्रतियोगी को 7 स्पर्धाओ में अपना प्रदर्शन करना पड़ता है।जो कि निम्न है
100 metres hurdles
High jump
Shot put
200 metres
Long jump
Javelin throw
800 metres
इन सातों स्पर्धाओं में प्रतियोगी को अलग-अलग स्पर्धाओं के लिए अंक दिए जाते हैं, जो प्रतियोगी सातो स्पर्धाओं मिलाकर सबसे ज्यादा अंक पाता है वह विजयी होता है।
भारत की बेटी Swapna Barman इसी Heptathlon स्पर्धा में Gold Medal जीता है।

swapna-barman-gyanchuski
Source: Google Images

Swapna के सपनों के आगे उनकी अक्षमताओं ने भी घुटने टेक दिए सन 1996 में West Bengal के जलपाईगुड़ी(Jalpaigudi) में जन्मी Swapna जोकि विषम परिस्थितियों में पली-बढ़ी, पर अपने सपनों से कभी समझौता नहीं किया, घर की स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं थी पिता रिक्शाचालक तथा मां चाय बागान में काम करने जाया करती थी, 2013 मे पिता के Stroke की वजह से परिवार की स्थिति और भी दुखद हो गई, लेकिन Swapna ने Practise नहीं छोड़ी,
हम आपको बता दें कि Swapnaके दोनों पैरों में 6-6 उंगलियां हैं, जिसकी वजह से उन्हें परेशानी का भी सामना करना पड़ा.

ना हार मानने वाला ज़ज़्बा

एक समय ऐसा भी था, जब उनके पास अपने पैरों के आकार के जूते (Runing shoes) खरीदने के पैसे भी नहीं थे,
तब भी वह सामान्य Runing Shoes पहनकर ही Practise किया करती थी, जिसकी वजह से उन्हें दर्द का भी सामना करना पड़ता था,लेकिन कहते हैं ना कि हिम्मतेमर्दा तो मददेखुदा
Swapna ने हार नहीं मानी,Swapna को खेलों में जो Prize Money मिलती उसी से वह अपने परिवार का खर्चा चलाती थी, सन 2016 में अपने दमदार खेल की वजह से उन्हें 1500000 का स्कॉलरशिप मिला, जिससे कुछ हद तक उनकी स्थिति सुधरी।
आज भारत कि इस लाडली ने जो कारनामा कर दिखाया है, वह हम सभी के लिए मिसाल है, कि हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए।
तिरंगा बस इसी तरह पुरे विश्व में लहराता रहे बस यही कामना है।

Leave a comment

Your email address will not be published.