ज्ञान गंगा की अमोघ चुस्की

बात उस महान शायर की जो नेहरु जी को जवाहरलाल कहकर बुलाते थे

बात उस महान शायर की जो नेहरु जी को जवाहरलाल कहकर बुलाते थे

थी कुछ अटकी हुई नींद जिंदगी उसकी,

फ़िराक़ को  जगाओ

बहुत अंधेरा है  

इन अंधेरों से उजालों के सफर को अपनी बेहतरीन शायरी में पिरोने वाले एक महान शायर जिसकी शख्सियत कुछ ऐसी थी की मानो यह बहती हवाए भी अपना सजदा उनके नाम कर जाती हो,
रघुपति सहायफिराक गोरखपुरी” जिनके बारे में जोश मलिहाबादी ने अपनी आत्मकथायादों की बारात में लिखा है कि –“उर्दू साहित्य में मीर और ग़ालिब के बाद कोई दूसरा शायर हुआ है तो वह  फिराक गोरखपुरी है
फिराक का जन्म सन 1896  को गोरखपुर के एक छोटे से गांव  बनवारपार में हुआ था  जो अब  “फिराकनगर  के नाम से जाना जाता है

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फिराक साहब आईएएस और पीसीएस के लिए चुने गए थे पर यह सब छोड़ वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े, जिसकी वजह से उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।
बाद में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाने लगे इसी बीच रहतेरहते उन्होंने उर्दू की बहुत सारी रचनाएं लिखी

उनमें से एक रचना जिसका नाम गुलेनगमा”  था जिसके लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया।
सन 1948 का एक किस्सा, जवाहरलाल नेहरू और रघुपति सहाय दोनों में बहुत बनती थी जब नेहरू जी 1948 में इलाहाबाद आए तो उन्होंने फिराक साहब को आनंद भवन बुलाया

अजयमान सिंह जो फिराक साहब के भांजे थे उन्होंने अपनी किताब ” Firaq Gorakhpuri a poet of Pen & extacy” मैं यह वाकया लिखते हैं कि –
फ़िराक़ को उस समय बहुत बेइज्जती महसूस हुई जब रिसेप्शनिस्ट ने उनसे कहा किआप कुर्सी पर बैठ जाएं और अपना नाम पर्ची पर लिख दे यह वही घर था जहां फ़िराक़ साहब ने 4 सालों तक काम किया था

इस बार नेहरु जी पहली बार प्रधानमंत्री के तौर पर इलाहाबाद आए थे और उनसे मिलने के लिए इंतजार करना पड़ रहा था
फिराक साहब ने पर्ची पर रघुपति सहाय लिखकर रिसेप्शनिस्ट को  दे दी
रिसेप्शनिस्ट ने दूसरी पर्ची पर R.Sahay  लिखकर पर्ची अंदर  भिजवा दी

बहुत इंतजार करने के बाद फिराक साहब का सब्र का बांध टूटा और वह रिसेप्शनिस्ट पर चिल्लाए –“मैं यहां जवाहरलाल के निमंत्रण पर आया हूं आज तक मुझे इस घर में रुकने से नहीं रोका गया है”
बहरहाल  जब नेहरू जी को  को अपने व्यस्त कामों से फुरसत मिले तो बता देना कि मैं 8/4 बैंक रोड  पर रहता हूं

Firaq-Gorakhpuri-Unkonw-Facts

यह कहते हुए जैसे ही वह उठने  को हुए, अंदर से नेहरू जी ने उनकी आवाज पहचान ली और  जल्दी से बाहर गए ,कि मानो जैसे श्री कृष्ण सुदामा से मिलने दौड़े बाहर चले आए और बोलेरघुपति तुम बाहर क्यों खड़े हो? अंदर क्यों नहीं गए?
Firaq  ने कहा घंटो पहले मेरे नाम की स्लिप आपके पास भेजी गई थी, नेहरु जी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दियामैं तुम्हें 30 वर्षों से रघुपति के नाम से जानता हूं R.sahay   से मैं कैसे  समझ पाता कि वह तुम हो
फिलहाल दोनों अंदर गए और अतीत की पुरानी यादों में खो गए।

नेहरु जी का अपार प्रेम देख फिराक बहुत अभिभूत हुए लेकिन फिराक एकदम मौन  थे
नेहरु जी ने पूछारघुपति तुम अब भी मुझसे नाराज हो।
Firaq मुस्कुराए और शेर से जवाब दिया

“तुम मुखातिब भी हो
करीब भी
तुमको देखे
कि तुमसे बातें करें”

मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई ने  अपनी किताब में फिराक का जिक्र करते हुए लिखा है कि,
फिराक का व्यक्तित्व ऐसा था कि वह गालियों को भी कविता में बदल देते थे
फिराक साहब की हिंदी कवियों में सिर्फ निराला से बनती थी,

फिराक  मुंहफट भी थे दिलदार भी ,आंखें गड़ाकर जब वह कुछ बोलते थे तो सामने वाले की आंखें खुदखुद झुक जाती थी

ऐसी धनी शख्सियत के मालिक थे हम सबके चहेते फिराक साहब
मरने के नाम पर यह कहते थे मैं मरूंगा नहीं सूरज सा अस्त हो जाऊंगा
ताउम्र उन्होंने उर्दू साहित्य के चरमोत्कर्ष के दर्शन कराएं और संसार से विदा लेते लेते अपनी अंतिम शायरी कह गए

” रुखसत तुझसे करता हूं
आओ संभालो साजे-गजल
नए तराने छेड़ो मगर
मेरी नज्मों को नींद आती है”।।

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