ज्ञान गंगा की अमोघ चुस्की

नेताजी की अनकही प्रेम की अनूठी दास्तान

नेताजी की अनकही प्रेम की अनूठी दास्तान

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नेताजी का नाम  स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाता है।  वह नेता जी थे जिन्होंने स्वतंत्रता की नींव भी रखी  और उसे समय-समय पर पक्का भी किया, जिसके फलस्वरुप  भारत आज स्वतंत्र है।
 वह कहते हैं ना कि कुछ  करतब मन के अंधियारों में आशा की अलख जगाते हैं,  उन्होंने भारत में जो स्वतंत्रता की अलख जगाई थी, बस उसे ही धेय्य मान कर उन्होंने बहुत सारी कुर्बानियां दी।
उनमें से जो सबसे बड़ी कुर्बानी थी वह उनके प्यार की थी।
जी हां

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 बात उस समय की है जब नेताजी  ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में थे, और अपनी किताब “The Indian Struggle”  लिख रहे थे।  इस किताब को लिखने के लिए उन्हें एक सहकर्मी की जरूरत पड़ी  जो उनके साथ उनकी किताब लिखने में मदद कर  सके।
डॉक्टर माथुर जो कि  वियना में ही एक फिजीशियन डॉक्टर थे, नेताजी की उनसे अच्छी बनती थी।
 नेताजी ने डॉक्टर माथुर से यह आग्रह किया कि अगर उनकी नजर में कोई  ऐसा हो जो  उनकी किताब लिखने में मदद कर सके ?
तब डॉक्टर माथुर ने नेताजी को एक ऑस्ट्रियन युवती से मिलवाया  जिनका नाम था Emilie Schenkl.
Emilie  को अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान था और वह शॉर्टहैंड में भी पारंगत थी।
फिर क्या था  नेताजी ने उन्हें तुरंत अपने यहां काम पर रख लिया। Emilie  की प्रखरता और उनकी शालीनता नेताजी को धीरे-धीरे पसंद आने लगी।

Netaji With Wife Emilie
Source:Google Images


शायद Emilie  की आंखों  ने भी इत्तला कर दिया था कि  उनका दिल भी सामने वाले के लिए धड़कने सा लगा  है।
खैर यह चाहत इजहार में बदली और दोनों  1937 में  विवाह बंधन में बंध गए।
Emilie  ने 29 नवंबर सन 1942 को एक बेटी को जन्म दिया।  नाम पड़ा Anita Bose Pfaff..
नेताजी भले ही शादी के बंधन में बंध गए थे।  लेकिन वह देश हित में काम करते रहे।
सन 1943 में  नेता जी ने देश को प्रथम प्राथमिकता देते हुए अपनी पत्नी और अपनी बेटी को अकेला छोड़  भारत माता की निस्वार्थ सेवा में  खुद को संलग्न कर लिया।
Emilie एक आदर्श पत्नी और एक आदर्श मां का जीता जागता उदाहरण थी। वो समझती थी कि उनके पति के लिए देश  सर्वोपरि है।  उन्होंने अपनी पुत्री को मां और बाप दोनों का प्यार दिया और उन्हें अपने पिता की कमी कभी महसूस नहीं होने दी।

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Source:google Images


इधर नेता जी ने भी आजादी का बिगुल बजा दिया था,   सब को एकत्र किया और गठन किया आजाद हिंद फौज का।  जिसमें लक्ष्मी सहगल जैसी महिलाओं ने भी अपना  संपूर्ण योगदान दिया।
Emilie  अपने पूरे परिवार की बागडोर अपने हाथ में ले ली और एक दूरभाष केंद्र में  काम पर लग गई।
सन 1948 में शरद चंद्र बोस  जो कि नेताजी के बड़े भाई थे  वियना आए और Emilie  से मुलाकात की  और उन्हें  भारत चलने के लिए कहा लेकिन Emile ने भारत जाने  के लिए साफ मना कर दिया।  उन्होंने वियना में  अपनी मां और अपनी बेटी के साथ  अपना बाकी जीवन  गुजारा।
जब जब हम नेताजी को याद करेंगे Emilie  क नाम   भी उनके साथ सहर्ष लिया जाएगा।

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