ज्ञान गंगा की अमोघ चुस्की

सिर्फ यहीं देखी जा सकती है सूर्य की अखंडित मूर्ति

आप भले ही देश-विदेश के कई म्यूज़ियम और लाइब्रेरी की सैर कर चुके होंगे, मगर बिहार की राजधानी पटना से करीब 30 किलोमीटर दूर भरतपुरा गांव में एक ऐसी लाइब्रेरी कम म्यूज़ियम है जहां ऐसा ऐतिहासिक खजाना देखने को मिलेगा जो कि भारत की किसी और लाइब्रेरी में नहीं है। चलिए आज हम आपको छोटे से गांव में बनी एक ऐसी ही खास और अनोखी गोपाल नारायण पब्लिक लाइब्रेरी की सैर कराते हैं।

पटना से पालीगंज जाने वाली टूटी सड़क पर ऐतिहासिक धरोहरों और खजानों को समेटे एक गांव है भरतपुरा और इसी गांव में एक ऊंचे टीले पर स्थित है गोपाल नारायण पब्लिक लाइब्रेरी। अकबर के शासन काल के दौरान यहां महाराष्ट्र से राजा कंचन सिंह आकर बसे थे। उनके वंशज राजा भरत सिंह ने यहां एक किले का निर्माण करवाया था। बाद में भरत सिंह के नाम पर ही इलाके का नाम भरतपुरा पड़ा। उन्हीं के वंशजों में से एक गोपाल नारायण सिंह ने 12 दिसंबर 1912 में इस लाइब्रेरी की स्थापना की। इसका उद्घाटन तत्कालीन जिलाधिकारी डब्लू डी आर प्रेंटिस ने किया था। शुरुआत में गोपाल नारायण ने अपने पुर्वजों से संबंधित कई एंटीक और खास वस्तुओं का संग्रहण उस लाइब्रेरी में किया। उसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने अपनी लाइब्रेरी कम म्यूजियम को ऐतिहासिक खजानों से भर दिया। बताया जाता है भरतपुरा गांव के आस-पास से खुदाई में कई ऐतिहासिक महत्व की चीजें प्राप्त हुई है जिन्हें इसी लाइब्रेरी में रखा गया है।

फिरदौसी के सचित्र शाहेनामा की इकलौती प्रति:-

गोपाल नारायण लाइब्रेरी कम म्यूज़ियम पूरे विश्व में एक मात्र ऐसी लाइब्रेरी है जहां फिरदौसी के सचित्र शाहेनामा की इलकौती प्रति मौजूद है। इस शाहेनामा में ईरान की सभ्यता, संस्कृति को नीलम और सोने द्वारा बनाए गए चित्रों के माध्यम से जाना सकता है। इसके अलावा यहां निज़ामी रचित सचित्र सिकंदरनामा, सलामत अली रचित मुताल-उल-हिंद, 11वीं सदी की दीवाने हाफिज जैसे कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक महत्व की किताबें और चित्र मौजूद हैं। वहीं यहां अकबर के नौ रत्नों में शुमार बसावन की पेटिंग साधु भी देखने को मिल सकती है। जबकि तार के पत्ते पर ब्रह्मी लिपि में लिखी महाभारत भी यहां के खास आर्कषण में से एक है। ध्रुपद नारायण कहते हैं कि हमारे यहां जो आंकड़े हैं उसके हिसाब से यह 780 ई. की है।

हाथी के दांत से बनी शाहजहां की छड़ी भी खास

एक छोटे से गांव में स्थित इस लाइब्रेरी में कई और भी एंटीक वस्तुएं आपका ध्यान ज़रूर खीचेंगी। यहां बाबर के समय के कई चिराग-ए-गुल हैं जो कि उस समय रोशनी फैलाने के काम में लाए जाते थे। वहीं हाथी के दांत से निर्मित शाहजहां की छड़ी भी इस म्यूजियम में सुशोभित है।
इसके अलावा यहां पंचमार्क सिक्के, अकबर के समय के दिन-ए-इलाही सिक्के, बुद्धा के समय के स्वर्ण सिक्के, एक तार से बनी साइकिल,खास घड़ी, पीपल के पत्ते पर गोल्ड से पेटिंग, मुगल पेटिंग, याक्षिणी की मूर्ति समेत कई अन्य बहुमूल्य वस्तुएं लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाली हैं। सिंह बताते हैं कि यहां धातुओं से बनी एक आदिवासी महिला का चित्र है जो कि हाथ में पुस्तक लिये हुए है। यह चित्र बताता है कि उस समय भी महिलाओं में शिक्षा के प्रति काफी रुचि थी। उस समय भी महिला सशक्तिकरण महत्वपूर्ण था।

तस्करी का शिकार हुआ:-

बात 1973 की है। 8 जनवरी की सर्द रात में सुरक्षा प्रहरी पर हमला करके तस्करों ने बहुमूल्य चित्रित पांडुलिपियां, शाहनामा, सिकंदरनामा, वैसलिस, मुता-उल-हिंद एवं अकबर के समकालीन चित्रकार की पेंटिंग उड़ा ले गए। असाम के सांसद एमएस गुहा ने संसद में आवाज उठाई तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरि तक बात पहुंची।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जून 1974 में पांडुलिपियों की चोरी की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा। सीबीआई ने तीन पांडुलिपियों को बरामद किया लेकिन मुता-उल-हिंद जो अकबर के समकालीन सलामत अली द्वारा लिखित था वह कैलिफोर्निया पहुंच चुका था। जिसको इंटरपोल के माध्यम से लाने का प्रयास किया जा रहा है। अन्य कॉपिया भारत के अन्य भागो से जब्त कर ली गई थीं।

सिर्फ यहीं देखी जा सकती है सूर्य की अखंडित मूर्ति:-

इस लाइब्रेरी में करीब 8000 पांडुलिपियों, 400 प्राचीन मूर्तियों, 1000 ऐतिहासिक चित्रों, 4000 से भी ज्यादा प्राचीन सिक्कों समेत कई एंटीक एवं ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं का संग्रह है। लाइब्रेरी के वर्तमान सचिव एवं गोपाल नारायण के पौत्र ध्रुपद नारायण सिंह बताते हैं कि यहां 5वीं सदी की शिव और पार्वती की श्रृंगारिक मुद्रा में एक ऐसी खास मूर्ति है जो कि देश-विदेश में कहीं नहीं है। वहीं 8वीं और 9वीं सदी में निर्मित सूर्य की 3 खास मूर्तियां हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार आज तक विश्व में सूर्य की ऐसी पूर्ण आकार की मूर्ति कहीं भी नहीं मिली है। यह मूर्ति 2012 में तीढ़ी मोड के पास चल रही खुदाई में मिली थी। इसके अलावा यहां नंदी की 8 किलोग्राम अष्टधातु की मूर्ति भी खास है। यहां भगवान बुद्ध की भी एक मूर्ति जो कि सिर्फ 8 इंच की है लेकिन वजन 10 किलोग्राम है, जो अपने आप में अनोखा है। यह मूर्ति गुप्त काल की बतायी जाती है। इसके अलावा मौर्य वंश समेत कई अन्य काल की खास मूर्तियां भी यहां की शोभा बनी हुई हैं।

लाइब्रेरी का महत्व:-

धुप्रद नारायण ने कहा कि अभी कुछ दिनों पहले पुणे में भी लाइब्रेरी कम म्यूजियम की स्थापना हुई है

  • लेकिन यहां जितने महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक खजानें उपलब्ध हैं, वह किसी अन्य लाइब्रेरी कम म्यूज़ियम में नहीं हैं। इसकी महत्ता को देखते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी यहां कई बार आ चुके हैं और इसे बड़ा स्वरूप देने की बात कह चुके हैं। वहीं दूसरे राज्यों एवं केन्द्र के पुरातत्व विभाग के अधिकारियों, लेखकों, कलाकारों और पत्रकारों ने भी इस लाइब्रेरी की महत्ता को स्वीकार किया है। इसके संचालन के लिए समिति गठित है। इसका चेयरमैन जिलाधिकारी होता है।

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