ज्ञान गंगा की अमोघ चुस्की

भारत के माथे की बिंदी यह है अपनी हिंदी

भारत के माथे की बिंदी यह है अपनी हिंदी

” उसने कहा था”

 किसने?

 पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने  क्या कहा था ?

तेरी कुड़माई हो गई ?

world hindi day gyanchuskiलहना सिंह,लपटन सिंह, वजीरा सिंह, कीरत सिंह

सैकड़ों वर्ष उपरांत  भी यह पात्र दिलो-दिमाग पर ऐसे घर कर गए हैं मानो यह सभी पात्र हमारे आसपास ही हो|

हिंदी साहित्य का यह घर ही कुछ ऐसा है ऐसे जब भी हम “अपनी खबर” बताने लगे तो साक्षात “पांडेय बेचैन शर्मा उग्र जी” याद आ जाते हैं

रानी केतकी भी भूल गई होंगी उनकी  कहानी को किसी “इंशा अल्लाह खान” ने हिंदी लिबास में लपेट कर अमर कर दिया

यह कारवाँ यही नहीं रुकता, बारिश जब भी अपना श्रृंगार दिखाती है तब हमें नागार्जुन बाबा  के उस बादल की याद आ जाती है जिसे उन्होंने घिरते  हुए देखा था|

बादलों, मेघो और बारिश की बूंदों के बीच रहना है हमें विद्यानिवास मिश्र जी से संपर्क  करना ही पड़ता है क्योंकि वह चेरापूंजी  से आए हैं ना -जहां रिमझिम बारिश की फुहार अपने चरमोत्कर्ष पर होती है और हम हिंदी रूपी कस्तूरी मृग  की भांति अपने अनंत कलेवरों  में ढलते जाते हैं|

एक बार मैंने  अपने किसी  जान पहचान वाले को  कोई काम कह रखा था, महानुभाव समक्ष प्रस्तुत हुए और बोल उठे- या काम तो आधा ही हुआ, मैं अनायास ही बोल उठा- क्या आपने भी “आधे अधूरे -मोहन राकेश” कर दिया और फिर सोचता हूं कि क्या कह दिया ?

लेकिन यह विडंबना ही है, कि यह बोल हृदय तल से निकलते हैं, हिंदी साहित्य के यह महनीय  नाम यूं ही नहीं बस गए, इनके पीछे इनकी विश्वसनीयता तथा इनका  हमारे समाज के समरूप होना है।

जैसे हिंदी फिल्मों में दोस्ती जय-वीरू सी हो ऐसा माना जाता है जबकि हमारे हिंदी साहित्य में “जुम्मनशेख और अलगू चौधरी” की दोस्ती बहुत प्रचलित है,अपितु यह प्रेम केवल मानव  मात्र तक सीमित नहीं है पशु भी इस बिरादरी में भी बराबर की हक़दार है। जी हां, हीरा- मोती दो बैलों की कहानी तो याद होगी ही|

पशु और मानव प्रेम की  झांकी भी यहां देखने को मिल जाएगी, बाबा भारती और उनका घोड़ा सुल्तान जिनका प्यार देखकर डाकू खड़ग सिंह बोल उठा था- कि बाबा यह घोड़ा में आपके पास ना रहने दूँगा!

हिंदी साहित्य की माधुर्यता  इतनी है कि यहां “नमक के दरोगा” का वर्चस्व किसी जनता के दरोगा से कम नहीं है

साथ-साथ यहां  “कढी में कोयला” की परिकल्पना भी साक्षात दृष्टिगोचर होती है|

एक  दिन फिल्म Raincoat  देख रहा था अजय देवगन वाली, बाबू गुलाब राय की रचना “नर से नारायण” मन में गोते लगाने लगी ,ताल- तलैया भूल -भुलैया वाली feelings आई,

आषाढ़ का महीना भी चल रहा था , वो कहते हैं ना जैसे रोगिया चाहे वैसे वैद्या फरमाए ,डिट्टो वैसे ही हो रहा था -बाहर सब बारिश से लबालब, टीवी पर Raincoat और मन  में “बाबू गुलाब राय” की “नर से नारायण”

उस आषाढ़ महीने में मन में जो “गुलाब राय थे” वे तुरंत अपने बगलगीर “मोहन राकेश जी” के पास पहुंचे और बोल उठे-  ई बताइए कि आपने जो “आषाढ़ का एक दिन” नाटक रचा है उसकी Recipe क्या है ?

मोहन राकेश जी बोल उठे -हम सब “सफर के साथी हैं” ये रास्ते  जिनको जैसे दिखे, वैसे ही उन्होंने उसे अपना कर उसे वैसा ही नाम दे दिया, जैसे “भगवती चरण वर्मा जी”ने इसे “टेढे-मेढे रास्ते” बताया तो ठीक इसके विपरीत इनके  सुदूर “तिरुमल्ले नम्बाकाम    वीर राघव आचार्य” जो मूल रूप से तिरुपति आंध्र प्रदेश के थे,

घबराइए मत इनके वृहद नाम  के विपरीत इनकी साहित्यिक सरलता इसी बात से प्रतीत होती है कि उन्होंने अपना नया साहित्यिक नाम -हिंदी की सरसता के अनुरूप -“रांगेय-राघव” रखा, और भगवती चरण वर्मा के समानांतर ही चले

एक रास्ता, तीन लोग लेकिन नाम भिन्न-भिन्न, यही  तो सुंदरता है हिंदी साहित्य की “भगवती चरण वर्मा जी” ने इन रास्तों को “टेढ़े- मेढ़े रास्ते” कहा जबकि रांगेय- राघव ने इसे नाम दिया “सीधा-साधा रास्ता”  मोहन राकेश जी ने इन दोनों लोगों के  समुच्चय को नाम दिया  -“सफर के साथी”

गुलाब राय को इस Recipe में नमक भी मिला, साथ- साथ चीनी और गुड़ की मिठास और इमली की चटकार  मिल गई,यह सब कुछ ठीक वैसे ही था जैसे “कमलेश्वर” जी ने अपने उपन्यास का जो नाम दिया

 “एक सड़क सत्तावन गलियाँ”

हिंदी साहित्य रूपी एक सड़क में यह 57 गलियाँ हमें पूर्ण रूप से हिंदी के इस छोर से उस छोर के दर्शन कराती हैं, आइए और इस सफर के साथी बन जाइए कसम से गर्व से बोल उठेंगे

भारत के माथे की बिंदी यह है अपनी हिंदी

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